जो सबका हित साधे वही साहित्यकार है: माया सिंह

मौजूदा हालातो को लेकर दुखी है प्रसिद्ध साहित्यकार माया सिंह

सत्य को ही सत्य कहे झूठ को झूठ कहे ऐसी लेखनी का सम्मान होना चाहिए

डा.माया सिंह साहित्यकार और कवियों को लेकर समाज में जो गिरावट आ रही है उसको लेकर दुखी है। उनका कहना है कि साहित्यकारों को स्वयं आत्म चिंतन करना होगा कि हम युवा पीढ़ी को क्या दे रहे है। जो सबका हित साधे वही साहित्यकार है। अब लोग स्वयं स्वहित कर रहे है। मंचों का सौदा हो रहा है। इससे वो साहित्यकार और कवि दुखी है जिन्होंने पूरा जीवन समाज को सही दिशा दिखाने में खपा दिया है। यह बात उन्होंने एक भेट वार्ता में कही। उन्होंने कहा कि इस साहित्यकार और कवियों ने समाज में व्याप्त रूढ़ बादी परम्पराओं को समाप्त करने में अहम भूमिका निभाई है। मंचों के माध्यम से हमारे वरिष्ठ जनों ने दिशा से भटके युवाओं के अंदर नई ऊर्जा का संचार करके उन्हें समाज हित में लगाया है। कवि और साहित्यकार का कर्तव्य बनता है कि हमेशा वह देश और समाज हित में अपनी भूमिका का सही निर्वाह करे। आज ऐसे ऐसे लोग मंचों से ज्ञान परोस रहे है जो खुद में अज्ञानी है। ऐसे में मन व्याकुल हो जाता है। आखिर में अपने मनकों को शांत करके बैठना ही ठीक मानते है। संवेदना साहित्य समिति की डा.माया सिंह ने इस रचना के जरिए अपनी वेदना को रखा। सत्य को ही सत्य कहे झूठ को जो झूठ कहे ऐसी लेखनी का सम्मान होना चाहिए
कविता की शुद्धता का ज्ञान भरी दिव्यता का कवियों को थोड़ा सा तो भान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के अधिकांशतः कुछ बच्चे जो ख्याति पाने के लिए शौकिया साहित्य की गरिमा से खिलवाड़ कर रहे हैं मंचों पर कुछ लोग सिर्फ मनोरंजन और चुटकुले बाजी को ही तवज्जो देते हैं कुछ आयोजक कार्यक्रम को मनोरंजन को केंद्र में रखकर कार्यक्रम करवाते हैं। उनका मानना है कि साहित्य समाज की आत्मा होता है। कविता और साहित्य न केवल भावनाओं को स्वर देते हैं, बल्कि सामाजिक चेतना को भी जागृत करते हैं। लेकिन आज के दौर में यह चिंताजनक है कि साहित्य और कविता का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। बाज़ारवाद, दिखावा और लोकप्रियता की होड़ में साहित्य की आत्मा जैसे खोती जा रही है। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. माया सिंह एक संवेदनशील लेखिका और समर्पित शिक्षाविद हैं, जिनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। डॉ. माया सिंह का कहना हे कि आज का साहित्य विविधता से भरपूर है, लेकिन उसमें गुणवत्ता की कमी साफ नजर आती है। साहित्य, जो कभी आत्मा का स्पंदन हुआ करता था, आज ‘कंटेंट’ बनकर रह गया है। बहुत से लोग केवल प्रसिद्धि पाने के लिए लिख रहे हैं, न कि समाज या आत्मा की गहराइयों को छूने के लिए। उन्होंने कहा कि अब दिखावा ज्यादा हो गया है। पुराने लेखक कवि फेसबुक, यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म का प्रयोग बहुत कम करते है जबकि आज के कवि इनका अधिक प्रयोग करके वो ख्याति पा लेते है जिसके लिए वह काबिल नहीं हे। दुर्भाग्य से अधिकांश लोग इसे एक त्वरित प्रसिद्धि के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। बिना आत्मचिंतन के जो कुछ मन में आया, वो पोस्ट कर दिया– यह प्रवृत्ति साहित्य को नुकसान पहुंचा रही है। डाक्टर माया सिंह कहती है कि पहले साहित्य आत्मानुभूति से उपजता था। रचनाकार समाज के दर्द को आत्मसात करके लिखता था। आज ‘ट्रेंड’ देखकर लिखा जा रहा है। पहले साहित्यकार स्वयं में बहुत पढ़ाकू और गहरे चिंतनशील होते थे, आज बहुतों के लिए यह एक शोबिज बन गया है। भाषा की गंभीरता, संवेदना की सघनता और विचारों की मौलिकता – इन सबमें गिरावट आई है। युवा लेखकों और कवियों के लिए उन्होंने कहा कि वह सबसे पहले, खूब पढ़ें। तुलसी, कबीर, मीरा से लेकर अज्ञेय, महादेवी, मुक्तिबोध तक – सभी को पढ़ें और आत्मसात करें। फिर समाज को देखें, महसूस करें और उसकी सच्चाई को साहित्य में स्थान दें। वायरल या प्रसिद्ध होने की जल्दबाज़ी न करें। साहित्य धैर्य और साधना की चीज़ है। अपने लेखन को परखें, संशोधित करें और आलोचना को स्वीकारें। जिससे कि हकीकत के आस पास रह सके। उनका कहना है कि आज के दौर में आलोचना लगभग खत्म हो गई है। सब एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं। आलोचना लेखन की रीढ़ होती है, जो लेखक को परिष्कृत करती है। जब आलोचक ईमानदारी से अपनी बात कहता है, तो लेखक को आत्ममंथन करने का अवसर मिलता है। लेकिन अब आलोचक भी ‘लाइक’ और ‘फॉलो’ की गणना में उलझे हुए हैं। यह सब ठीक नहीं है।
वह कहती है कि मैं समय के साथ चलने की कोशिश करती हूँ, लेकिन अपनी मूल संवेदनाओं से समझौता नहीं करती। मैं नए माध्यमों पर भी लिखती हूँ, लेकिन हर रचना से पहले आत्मपरीक्षण करती हूँ – क्या यह कविता समाज को कुछ दे रही है? क्या इसमें भावना की सच्चाई है? अगर उत्तर ‘हाँ’ है, तब ही उसे साझा करती हूँ। डॉ. माया सिंह के विचार साहित्य और कविता के गिरते स्तर को लेकर एक संवेदनशील साहित्यकार की चिंता को उजागर करते हैं। उनका कहना है कि साहित्य की गरिमा को बचाने के लिए रचनाकारों, पाठकों, प्रकाशकों और शिक्षकों – सभी को अपनी भूमिका समझनी होगी। साहित्य समाज का आईना है, और अगर उसमें धुंध भर जाएगी तो आने वाली पीढ़ियाँ खुद को कैसे पहचानेंगी?

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