ऐतिहासिक माहिल तालाब पर कजली मेले में उमड़ी भीड़

सीधे बोल से मनोज सैनी की रिपोर्ट

कजरिया देकर गले मिले लोग
बच्चों को आकर्षित करती रही दुकानों
बुंदेलखंड की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करने वाला कजली मेला रविवार को ऐतिहासिक माहिल तालाब पर बड़े हर्षोल्लास के साथ आयोजित हुआ। सुबह से ही माहिल तालाब परिसर रंग-बिरंगे परिधानों, लोकगीतों की स्वर लहरियों और पारंपरिक रौनक से भर गया। शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आए सैकड़ों लोग इस मेले में शामिल हुए। जनप्रतिनिधियों ने भी यहां पहुंच कर लोगों को बधाई दी।

कजली का सांस्कृतिक महत्व
कजली मेला बुंदेलखंड और आसपास के क्षेत्रों की एक पुरानी लोक परंपरा है, जो सावन के महीने में विशेष रूप से मनाई जाती है। इसमें महिलाएं और युवतियां अपने ससुराल या मायके से आई हुई ‘कजरिया’—एक विशेष प्रकार का गीत और रस्म—एक-दूसरे को देती हैं। यह आपसी प्रेम, स्नेह और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। मेले में इस बार भी महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में सजधज कर एक-दूसरे को कजरिया दी और गले मिलकर शुभकामनाएं दीं।

ऐतिहासिक माहिल तालाब की पृष्ठभूमि
माहिल तालाब का नाम बुंदेलखंड के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यह तालाब न केवल जल संरक्षण का प्राचीन उदाहरण है बल्कि उरई की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है। सावन-भादो के त्योहारों और मेलों के दौरान यहां हमेशा भारी भीड़ रहती है। कजली मेला यहां सदियों से आयोजित हो रहा है, और यह परंपरा आज भी वैसी ही जीवंत है जैसी वर्षों पहले थी।

सुबह से ही शुरू हुई रौनक
सुबह होते ही तालाब परिसर में मेले का माहौल बनने लगा। रंगीन झूले, खाने-पीने के स्टॉल, खिलौनों की दुकानें और लोक कलाकारों के मंडप सज गए। दूर-दराज से आए व्यापारी और हस्तशिल्पी अपने सामान के साथ पहुंचे थे। मेले में बच्चों के लिए झूले और चकरी, महिलाओं के लिए श्रृंगार सामग्री और पुरुषों के लिए पारंपरिक वस्त्रों की दुकानें विशेष आकर्षण का केंद्र बनीं।

कजरिया देने का दृश्य
दोपहर होते-होते मेले का मुख्य आकर्षण शुरू हुआ—कजरिया देने की रस्म। महिलाएं और युवतियां जोड़े में बैठकर कजरिया गातीं, फिर एक-दूसरे के माथे पर हाथ फेरकर प्रेम और आशीर्वाद देतीं, और फिर गले लग जातीं। यह दृश्य देखकर माहौल भावुक भी हो जाता और आनंदमय भी। कई बुजुर्ग महिलाएं अपनी पुरानी यादें ताजा करते हुए कहतीं कि “जब हम नई-नई ब्याही आई थीं, तब भी इसी तालाब पर कजरिया दी थी।”

एक दिन बाद निकलती है कजरिया

सावन के दूसरे दिन जिले में कजरिया निकलती है। इसके पीछे कई तरह की किवदंतियां है। रक्षा बंधन के अगले दिन घरों में बोई जाने वाली कजरिया महिलाएं अपने सिर पर रखकर माहिल तालाब पहुंची। यहां पर उन्होंने मिट्टी के वर्तन में बोई कजरियों का विसर्जन तालाब में किया।

प्रशासन की व्यवस्था
जिला प्रशासन और नगर पालिका ने मेले के सुचारू संचालन के लिए विशेष व्यवस्थाएं की थीं। सुरक्षा के लिए पुलिस बल तैनात था, और सफाई कर्मियों ने पूरे मेले क्षेत्र को स्वच्छ बनाए रखा। पानी की पर्याप्त व्यवस्था की गई, ताकि गर्मी और भीड़ में किसी को असुविधा न हो।

परिवारों और दोस्तों की मुलाकात का अवसर
कजली मेला केवल सांस्कृतिक आयोजन ही नहीं, बल्कि लोगों के मिलने-जुलने का भी अवसर होता है। कई परिवार और रिश्तेदार साल भर बाद इस मेले में मिलते हैं। बच्चे मेले में नए खिलौने और मिठाइयों का आनंद लेते हैं, तो बुजुर्ग पुराने परिचितों से मिलकर पुराने दिनों को याद करते हैं। इस बार भी मेले ने लोगों को जोड़ने का वही काम किया, जिसके लिए यह प्रसिद्ध है।

व्यापारिक रौनक भी चरम पर
मेले के दौरान दुकानदारों की भी खूब चांदी रही। खाने-पीने की दुकानों पर गाहकों की भीड़ लगी रही। हस्तशिल्प की दुकानों पर पारंपरिक गहने और लकड़ी के खिलौने खूब बिके।

महिलाओं में विशेष उत्साह
कजली मेला खासकर महिलाओं के लिए एक सामाजिक और भावनात्मक अवसर होता है। वे महीनों पहले से इसकी तैयारी करती हैं—नई साड़ियां, गहने, मेहंदी, और गीतों की रिहर्सल। इस बार भी महिलाओं में इसका खास उत्साह देखने को मिला। कई समूहों ने पहले से तय कर रखा था कि वे एक साथ तालाब पहुंचकर कजरिया देंगी और गीत गाएंगी।

व्यापार मंडल मेले में लेता है बढ़ चढ़ कर हिस्सा

कजली मेले में व्यापार मंडल की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।व्यापार मंडल अलग अलग स्टाल लगाकर मेले में आए लोगों को गले मिलने का मौका देता है। यहां पानी सहित अन्य व्यवस्थाएं भी की जाती है। जन प्रतिनिधि अपनी सहूलियत के हिसाब से व्यापार मंडल के स्टालों पर जाकर लोगों से मिलने के लिए खड़े होते है।

समापन और विदाई
शाम ढलते-ढलते मेले का समापन हुआ। लोग अपने-अपने घरों की ओर लौटे, लेकिन उनके चेहरों पर दिनभर की खुशी और अपनापन साफ झलक रहा था। माहिल तालाब का किनारा शाम को भी रोशनी और भीड़ से गुलजार था। जाते-जाते कई लोग अगले साल फिर मिलने का वादा कर रहे थे।

कजली मेला न केवल बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान है, बल्कि यह इस क्षेत्र की सामाजिक एकता और आपसी प्रेम का प्रतीक भी है। बदलते समय में भी इस परंपरा का जीवित रहना इस बात का प्रमाण है कि यहां की मिट्टी में अभी भी लोक संस्कृति की जड़ें गहरी हैं।
इस मौके पर सदर विधायक गौरीशंकर वर्मा,रामलखन महाराज,गिरीश चतुर्वेदी, दिलीप सेठ,प्रदीप दीक्षित,अग्निवेश चतुर्वेदी,हरिओम बाजपेई,अमित निरंजन प्रमुख रूप से मौजूद रहे।

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