तालाबों पर अतिक्रमण, गंदगी से खो रहा कदौरा का जलस्रोतों का अस्तित्व


कदौरा। कभी स्वच्छ वातावरण और जीवनयापन का आधार रहे तालाब आज अतिक्रमण और गंदगी की भेंट चढ़ चुके हैं। नगर कस्बा क्षेत्र के कुल 13 तालाबों में से केवल सदर तालाब को छोड़कर लगभग सभी तालाबों पर अतिक्रमण और जलकुंभी का कब्जा है।
स्थानीय व क्षेत्रीय लोगों फ़ज़ल खां ,राघवेन्द्र सिंह,डा असद, वेदप्रकाश आदि का कहना है कि दशकों पहले इन तालाबों का उपयोग घरेलू निस्तार, पशुओं के पानी पीने और स्नान आदि के लिए होता था। मोहल्लों के लोग तालाबों को स्वच्छ रखते थे। उस समय पीने के पानी की आपूर्ति टंकियों और नलों से होती थी, जबकि अन्य सभी जरूरतों के लिए तालाब ही सहारा थे। लेकिन समय के साथ मोहल्ले वालों ने ही तालाबों के किनारों पर कूड़ा-कर्कट और मिट्टी डालकर समतल करना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे वहां पर मकान खड़े कर दिए। आज स्थिति यह है कि नगर के अधिकांश प्रति तालाबों में 10 से अधिक कच्चे-पक्के मकान बन चुके हैं।

ग्राम पंचायतों में भी तालाबों की दुर्दशा

कदौरा क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में भी तालाबो का अस्तित्व संकट में है। हरचंदपुर के 5 तालाबों में से 2 पूरी तरह खत्म हो चुके हैं, जबकि शेष 3 में अतिक्रमण और गंदगी भरी पड़ी है। लोदीपुर गांव के शंकर तालाब के पार में 13 घरों का अवैध कब्जा हो चुका है। ,बबीना गांव के बाल्मीकि तालाब में करीब 20 पक्के और 5 कच्चे घर बन गए हैं। कुसमरा ग्राम का 2 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाला बड़ा तालाब लगभग 25 घरों के अतिक्रमण की वजह से अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच गया है। यदि समय रहते प्रशासन ने सख्त कदम नहीं उठाए तो आने वाले समय में तालाबों का अस्तित्व पूरी तरह मिट जाएगा। तालाब न केवल जलस्रोत का आधार हैं, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।


कस्बा निवासी फ़ज़ल ख़ां बताते हैं कि करीब 20 साल पहले सारे घरेलू कामकाज तालाबों में ही होते थे। लोग नहाने, कपड़े धोने और पशुओं को पानी पिलाने के लिए इन्हीं तालाबों पर निर्भर रहते थे। तब तालाब साफ-सुथरे और खुले वातावरण का प्रतीक थे, लेकिन आज हालत देखकर बहुत दुख होता है।बाकि जरूरतें तो दूर ,पैर धुलने लायक भी नहीं बचे हैं तालाब।
इनसेट


हरचंदपुर ग्राम निवासी राघवेन्द्र सिंह का कहना है कि लोगों का साल भर का खाने-गल्‍ला इन्हीं तालाबों में धुलता था। घर-घर के लोग अपने अनाज और कपड़े धुलने तालाब पर आते थे। पूरे 12 घंटे तालाब घाटों पर चहल-पहल रहती थी। सुबह से लेकर देर शाम तक महिलाएं कपड़े धोतीं, बच्चे नहाते और पशु पानी पीते नजर आते थे। यह सिर्फ पानी का स्रोत नहीं था, बल्कि पूरे गांव की सामाजिक गतिविधियों का केंद्र था।

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