कालपी छौंक कांड: जमीनी फर्जीवाड़ा में दो पुलिस अधिकारी निलंबित

फर्जी आधार कार्ड घोटाले की कड़ी से मचा हड़कंप

उरई (जालौन)। जनपद का चर्चित छौंक कांड एक बार फिर सुर्खियों में है। दो वर्ष पूर्व सामने आए इस बहुचर्चित जमीनी फर्जीवाड़े की जांच में गंभीर लापरवाही उजागर होने के बाद शासन के निर्देश पर शनिवार को बड़ी कार्रवाई हुई। कालपी कोतवाल परमहंस तिवारी और कालपी में तैनात रहे अतिरिक्त प्रभारी, जो वर्तमान में झांसी में निरीक्षक पद पर कार्यरत हैं, मुहम्मद अशरफ को निलंबित कर दिया गया। इस कार्रवाई से जिले के पुलिस महकमे में खलबली मच गई है।
यह मामला 28 अगस्त 2023 का है। कालपी तहसील के छौंक गांव निवासी विद्यावती पुत्री मुनीश्वर पत्नी रघुवीर सिंह यादव की हाईवे पर स्थित कीमती जमीन, जिसकी कीमत लगभग 2 करोड़ 17 लाख रुपये आंकी गई थी, को फर्जीवाड़े से बेचा गया। आरोपियों ने साजिश रचकर धमना गांव की छिद्दन पत्नी रघुवीर सिंह यादव का आधार कार्ड विद्यावती के नाम से बनवाया। इसके बाद छिद्दन को विद्यावती बताकर पेश किया गया और जमीन का बैनामा करा दिया गया। जब विद्यावती को धोखाधड़ी का पता चला तो खरीदार कोमल सिंह यादव ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। मामले की विवेचना तत्कालीन अतिरिक्त प्रभारी निरीक्षक मुहम्मद अशरफ को सौंपी गई। जांच के दौरान कई नाम सामने आए और पुलिस ने 26 लोगों को आरोपित बनाया। इनमें संदीप, नमन, महेंद्र सिंह, शैलेंद्र सिंह, मनीष, जगमोहन, जितेंद्र, सचिन, आशीष सिंह, अनमोल, आशुतोष और प्रशांत समेत कई लोग शामिल थे। जांच में पुलिस ने 17 लाख 80 हजार रुपये नकद और डेढ़ लाख रुपये की चेन भी बरामद की थी। हालांकि, अदालत में अधिकांश आरोपी बरी हो गए। आरोपियों की ओर से विवेचना में खामियों का मुद्दा उठाया गया। इस बीच आरोप लगा कि विवेचक मुहम्मद अशरफ ने जांच में गंभीर लापरवाही की और कुछ आरोपियों को बचाने का प्रयास किया। बाद में कुछ अभियुक्त हाईकोर्ट पहुंच गए। हाईकोर्ट के आदेश पर एसआईटी गठित हुई और जांच परमहंस तिवारी को सौंपी गई। मगर उन्होंने भी काफी हद तक पूर्व विवेचना का समर्थन किया।


बीते दिनों 34 हजार फर्जी आधार कार्ड बनाने के घोटाले में उरई निवासी धर्मेंद्र सक्सेना को कोलकाता से गिरफ्तार किया गया। वह अंडमान-निकोबार की आईडी पर यह गोरखधंधा चला रहा था। जांच में खुलासा हुआ कि छौंक कांड में प्रयुक्त फर्जी आधार कार्ड भी उसके ही केंद्र से बना था। चौंकाने वाली बात यह रही कि पहले की विवेचना के दौरान पुलिस ने धर्मेंद्र सक्सेना को छोड़ दिया था और उसके ऑपरेटर सचिन सिंह को आरोपी बना दिया था। अब धर्मेंद्र की गिरफ्तारी ने विवेचना की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए। यही वजह रही कि मामले की जांच फिर से तेज हो गई।
पुलिस अधीक्षक डॉ. दुर्गेश कुमार ने मामले की जांच सीओ अवधेश कुमार सिंह को सौंपी। उन्होंने शुक्रवार से ही जांच की बारीकियां खंगालनी शुरू कर दीं। प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में तत्कालीन विवेचक मुहम्मद अशरफ और एसआईटी प्रभारी रहे परमहंस तिवारी की भूमिका संदिग्ध पाई गई। इसी आधार पर दोनों अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। छौंक कांड केवल यहीं तक सीमित नहीं है। जानकारों का कहना है कि इस पूरे फर्जीवाड़े में कई और अहम किरदारों की भूमिका जांच के दायरे में आ सकती है।

डॉक्टर की भूमिका संदिग्ध : बताया जा रहा है कि विद्यावती के नाम से आधार कार्ड बनवाने में जिस डॉक्टर ने मेडिकल रिपोर्ट लगाई थी, उस पर भी कार्रवाई की तलवार लटक रही है।

उपनिबंधक की भूमिका : उपनिबंधक पर भी सवाल हैं, जिन्होंने ऑफिस छोड़कर हाईवे किनारे जाकर रजिस्ट्री की। इस प्रक्रिया ने उनकी नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अधिवक्ता का सत्यापन : बैनामा में सत्यापन करने वाले अधिवक्ता की भूमिका भी जांच के घेरे में है।

अन्य सहयोगी : कुछ और लोग, जिन्होंने विवेचना को गुमराह करने या साक्ष्यों को दबाने में भूमिका निभाई, उन पर भी कार्रवाई हो सकती है।

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