अधिवक्ता की पैरवी लाई रंग: मृतिका के पिता को न्यायालय से मिला न्याय


उरई (जालौन)। एक लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार पीड़ित पिता को न्याय की किरण दिखाई दी, जब माननीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जालौन (उरई) ने मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी किया। यह सफलता अधिवक्ता नेहा निरंजन जिला विधिक सचिव भारतीय मानवधिकार एशोसिएशन जालौन की सुनियोजित और प्रभावी पैरवी का परिणाम मानी जा रही है, जिसने एक निराश पिता के मन में न्याय की उम्मीद फिर से जगा दी।

मृतिका के पिता अरुण कुमार देवपुरिया ने बताया कि उनकी पुत्री सोनम का विवाह 1 जून 2021 को संजय नगायच के साथ हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। विवाह के बाद से ही ससुराल पक्ष द्वारा अतिरिक्त दहेज की मांग शुरू कर दी गई। पहले सोने का हार और फिर चार पहिया वाहन की मांग को लेकर उनकी पुत्री को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा। समाज के दबाव में कुछ समय के लिए स्थिति सामान्य हुई, लेकिन जल्द ही प्रताड़ना फिर शुरू हो गई।

पीड़ित के अनुसार, लगातार उत्पीड़न और उचित इलाज के अभाव में उनकी पुत्री की तबीयत बिगड़ती चली गई और वह टीबी जैसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गई। वर्ष 2025 में इलाज के दौरान 31 अक्टूबर को उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद भी पिता को न्याय पाने के लिए दर-दर भटकना पड़ा, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई।

थक-हारकर उन्होंने न्यायालय की शरण ली, जहां अधिवक्ता नेहा निरंजन ने मामले को मजबूती से प्रस्तुत किया और अधिवक्ता नेहा निरंजन के सानिध्य में जूनियर अधिवक्ता दीपक कुमार जिला कल्याण सचिव ने उनका सहयोग किया। न्यायालय ने सभी साक्ष्यों—जैसे पोस्टमार्टम रिपोर्ट, इलाज के दस्तावेज, रजिस्ट्री रसीद, विवाह कार्ड आदि—का अवलोकन करने के बाद पाया कि प्रथम दृष्टया यह गंभीर और संज्ञेय अपराध का मामला है।

माननीय न्यायालय ने दिनांक 03 अप्रैल 2026 को आदेश देते हुए थाना जालौन को निर्देशित किया कि संबंधित धाराओं में तत्काल एफआईआर दर्ज कर विवेचना शुरू की जाए और तीन दिनों के भीतर रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जाए।

इस आदेश से पीड़ित पिता को न्याय मिलने की आश जगी है और यह मामला उन लोगों के लिए एक उदाहरण बन गया है जो अन्याय के खिलाफ लड़ाई में हार मान लेते है।

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