जैसारी डबल मर्डर केस: सजा बरकरार, फिर भी रिहाई की मांग—हाईकोर्ट में सुनवाई से बढ़ी हलचल

हरगोविंद राजपूत जैसारी डबल मर्डर केस फिर चर्चा मे

उरई जालौन (उत्तर प्रदेश)। अपने समय का बेहद चर्चित जैसारी डबल मर्डर केस एक बार फिर सुर्खियों में है। दशकों पुराने इस सनसनीखेज मामले में सजा बरकरार रहने के बावजूद अब सह-अभियुक्त की रिहाई को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका पर सुनवाई चल रही है, जिसे लेकर कानूनी और सामाजिक हलकों में खासा ध्यान केंद्रित हो गया है। यह मामला जालौन जनपद के थाना डकोर क्षेत्र के ग्राम जैसारी से जुड़ा है, जहां हुए दोहरे हत्याकांड ने उस दौर में पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। इस प्रकरण में हरगोविंद राजपूत को दोषी ठहराया गया था। सत्र न्यायालय ने वर्ष 1980 में उसे सजा सुनाई थी। इसके बाद वर्ष 2003 में उच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा। आगे चलकर वर्ष 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस फैसले पर अपनी मुहर लगाते हुए सजा को यथावत रखा। मामले को उस समय और अधिक चर्चा तब मिली, जब अपील लंबित रहने के दौरान ही हरगोविंद राजपूत की हत्या हो गई। इसके बाद पूरा मामला लंबे समय तक शांत रहा, लेकिन अब सह-अभियुक्त रतन माली की रिहाई को लेकर दायर याचिका ने इसे फिर से चर्चा में ला दिया है। बताया जा रहा है कि रतन माली लंबे समय से आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। उसकी ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान अधिवक्ता वाई. डी. मिश्रा एवं शिवांगी चतुर्वेदी ने अदालत के समक्ष प्रभावी पैरवी की। उन्होंने तर्क दिया कि कैदी ने काफी लंबा समय जेल में बिताया है और वह राज्य सरकार की रिमिशन नीति के अंतर्गत रिहाई का पात्र है। अधिवक्ताओं ने न्यायालय से अनुरोध किया कि राज्य सरकार को इस मामले में समयबद्ध और निष्पक्ष निर्णय लेने के निर्देश दिए जाएं। वहीं, राज्य सरकार की ओर से मामले की गंभीरता का हवाला देते हुए इसे एक जघन्य डबल मर्डर केस बताया गया और रिहाई के विषय में अत्यंत सावधानी बरतने की बात कही गई। इस प्रकरण में अधिवक्ता वाई. डी. मिश्रा एवं शिवांगी चतुर्वेदी की सशक्त और प्रभावशाली पैरवी कानूनी जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है। अब सभी की निगाहें उच्च न्यायालय के अगले आदेश पर टिकी हैं, जो इस लंबे समय से चले आ रहे मामले में अहम मोड़ साबित हो सकता है।

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